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“ख़ुद तो मंदिर में रखी दान पेटी के लिए लड़ते हैं… और बेरोज़गार लड़कों को सड़क पर खड़ा कर एक-दूसरे से भिड़वाते हैं…”

ये शब्द आज के भारत के उस समाज का चेहरा हैं, जो दिखने में तो आधुनिक है, लेकिन सोच और दिशा के मामले में भटकता जा रहा है।

🔴 “ख़ुद तो मंदिर में रखी दान पेटी के लिए लड़ते हैं… और बेरोज़गार लड़कों को सड़क पर खड़ा कर एक-दूसरे से भिड़वाते हैं…” — ये शब्द आज के भारत के उस समाज का चेहरा हैं, जो दिखने में तो आधुनिक है, लेकिन सोच और दिशा के मामले में भटकता जा रहा है।

👉 जहां नेता अपनी कुर्सियों के लिए लड़ते हैं, वहीं युवाओं को धर्म, जाति और नफरत के नाम पर लड़ाया जा रहा है।

📌 जबकि जरूरत है — नौकरी की, शिक्षा की, स्वास्थ्य की और सम्मान की।

🚨 समाज का वो वर्ग जो सबसे ज्यादा उर्जावान है — यानी युवा — उसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन उसके हक़ की बातें कोई नहीं करता।


अब सवाल ये है:

🔹 क्या देश के युवाओं को झूठे नारों और नफरत की राजनीति का मोहरा बना दिया गया है?
🔹 क्या हम भूल गए हैं कि यही युवा कल का भारत है?
🔹 क्या अब असली सवालों से ध्यान भटकाना ही राजनीति बन गया है?


📢 समाज को बदलने का वक्त आ गया है।

हम सबको यह पूछना चाहिए —
🗣️ “रोज़गार कब मिलेगा?”
🗣️ “शिक्षा के नाम पर सिर्फ इमारतें क्यों बन रही हैं, शिक्षक क्यों नहीं?”
🗣️ “सड़कों पर लड़ने वाले युवाओं को नौकरी कब मिलेगी?”


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“जहां सच ज़िंदा है!”
✍️ रिपोर्ट: एलिक सिंह
📞 संपर्क: 8217554083
📍 जिला प्रभारी, भारतीय पत्रकार अधिकार परिषद (BJAC)

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